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इतिहास वाली खिड़की : खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी | The Great Rani Lakshmibai of Jhansi



सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से उठाई हुयी ये एक पंक्ति रानी लक्ष्मीबाई को इतना भरपूर रूप से भरे हुए है की इसके बजाये किसी और पंक्ति को इस लेख का शीर्षक बनाना बेमानी है | बचपन से जब भी हिन्दुस्तान की आज़ादी का किस्सा कहीं भी सुना वहां सबसे पहले इस नाम को गूंजते देखा | कहने और देखने में सिर्फ एक स्त्री जो की हमारी पितृसतात्मक सोच के हिसाब से सिर्फ चूल्हा चौका करने के लिए जन्म लेती है, जब बेलन के बजाय हाथो में खड़ग लेकर जंग के मैदान में उतरती है तो सैकड़ों की टोली में आये गोरों को भी धूल फांकनी पड़ जाती है | तो ऐसी वीरांगना के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे है अपने इस नए कॉलम इतिहास की खिड़की में |

कैसे मणिकर्णिका बनी रानी लक्ष्मीबाई ?

वाराणसी जिले के एक छोटे से गाँव भदैनी में 19 नवम्बर 1835 को एक एक मराठी परिवार में एक लड़की का जन्म हुआ | माँ भागीरथीबाई और पिता मरोपंत ताम्बे के सिवा घर में कोई भी इस लड़की के जन्म से खुश नहीं था | घरवालों ने नाम रख दिया मणिकर्णिका | 4 साल बीतते ही भागीरथीबाई चल बसीं | नन्ही मणिकर्णिका को सब प्यार से मनु पुकारने लगे | हमउम्र लड़कियां जब गुरुकुल से शास्त्रों का ज्ञान इक्कट्ठा करके घर का काम सीखती थीं तब मनु अपने पिता के साथ शस्त्रों का ज्ञान लेती थी | घुड़सवारी और तलवारबाजी में मनु का लोहा पूरा गाँव मानता था | 

आगे चलकर 16 वर्ष की उम्र में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं | विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया | सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी | सन 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी | पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी |

कैसे बनी अंग्रेजों की गले की फाँस ?

अंग्रेजी हुकुमत से संघर्ष के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया | इस सेना में महिलाओं की भी भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। झाँसी की आम जनता ने भी इस संग्राम में रानी का साथ दिया |


अंग्रेजों के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई की जंग में कई और अपदस्त और अंग्रेजी हड़प नीति के शिकार राजाओं जैसे बेगम हजरत महल, अंतिम मुगल सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, वानपुर के राजा मर्दनसिंह और तात्या टोपे आदि सभी महारानी के इस कार्य में सहयोग देने का प्रयत्न करने लगे | सन 1858 के जनवरी महीने में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया | लगभग दो हफ़्तों के संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया पर रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच कर भाग निकली | झाँसी से भागकर रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं |


तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई की संयुक्त सेना ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया | रानी लक्ष्मीबाई ने जी-जान से अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया पर 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त की |



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