Hinduism

जब पालनहार को लेना पड़ा मोहिनी का अवतार | Full story behind Lord Vishnu Mohini avatar



कब और क्यों लेना पड़ा भगवान विष्णु को मोहिनी अवतार :

भगवान विष्णु के इस अवतार की सबसे बड़ी वजह समुद्र मंथन थी। जब समुद्र मंथन से एक एक करके दिव्या रत्न और उपहार निकल रहे थे तब उसी के बीच कुछ ऐसा पकात हुआ जिसने असुर और देवताओं दोनों के खेमे में हलचल मचा दी। दरसल अब समुद्र से वैद्यराज धन्वन्तरी निकले

 

भगवान विष्णु के अंशभूत धन्वन्तरी, जो आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं, हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश लिए प्रकट हुए। दैत्यों ने उनके हाथ से अमृत छीन लिया ओर उसमे से आधा देवताओं को देकर वे सब चलते बने। उनमें जम्भ आदि दैत्य प्रधान थे। उन्हें जाते देख भगवान विष्णु ने स्त्री रूप धारण किया। उस रूपवती स्त्री को देखकर दैत्य मोहित हो गए ओर बोले-'सुमुखी! तुम हमारी भार्या हो जाओ ओर यह अमृत लेकर हमें पिलाओ।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् ने उनके हाथ से अमृत ले लिया ओर उसे देवताओं को पिला दिया। 


उस समय राहू चंद्रमा का रूप धारण करके अमृत पीने लगा। तब सूर्य और चंद्रमा ने उसके कपट-वेश को प्रकट कर दिया। यह देख भगवान श्रीहरि ने चक्र से उसका मस्तक काट डाला। उसका सर अलग हो गया और भुजाओं सहित धड़ अलग रह गया। फिर भगवान को दया आ गयी और उन्होंने राहू को अमर बना दिया। तब ग्रहस्वरूप राहू ने भगवान  श्रीहरि से कहा - 'इन सूर्य और चंद्रमा को मेरे द्वारा अनेकों बार ग्रहण लगेगा। उस समय संसार के लोग जो कुछ दान करें, वह सब अक्षय हो। भगवान विष्णु ने 'तथास्तु' कहकर सम्पूर्ण देवताओं के साथ राहू की बात का अनुमोदन किया।

 जब भगवान शिव मोहिनी की माया में फँस गये :


इसके बाद भगवान् ने स्त्री रूप त्याग दिया; किन्तु महादेव जी को भगवान के उस रूप का पुनर्दर्शन करने की इच्छा हुई। अतः उन्होंने अनुरोध किया-भगवन! आप अपने स्त्री रूप का मुझे दर्शन करेवें। महादेवजी की प्रार्थना से भगवान् श्रीहरि ने उन्हें अपने स्त्रीरूप का दर्शन कराया। वे भगवान् की माया से मोहित हो गए की पार्वतीजी को त्याग कर उस स्त्री के पीछे लग गए। उन्होंने नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनी के केश पकड़ लिये। मोहिनी अपने केशों को छुडवाकर वहां से चल दी। उसे जाती देख महादेव जी भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे। 


उस समय पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ भगवान् शंकर का वीर्य गिरा, वहां-वहां शिवलिंगों का क्षेत्र एवं सुवर्ण की खानें हो गयी। तत्पश्चात 'यह माया है' - ऐसा जान कर भगवान् शंकर अपने स्वरूप में स्थित हुए। तब भगवान श्रीहरि ने प्रकट होकर शिवजी से कहा- 'रूद्र! तुमने मेरी माया को जीत लिया है। पृथ्वी पर तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मेर्री इस माया को जीत सके।' भगवान् के प्रयत्न से दैत्यों को अमृत नहीं मिलने पाया; अतः देवताओं ने उन्हें युद्ध में मार गिराया। फिर देवता स्वर्ग में विराजमान हुए और दैत्यलोग पाताल में रहने लगे। जो मनुष्य देवताओं की इस विजयगाथा का पाठ करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है।



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