Hinduism

भगवान विष्णु और शिव में हुई थी लड़ाई, पता है कौन जीता ? | Who won the fight between Vishnu and Shiva ?



देवाताओं और राक्षस के युद्ध की तो कई कहानियां आपने सुनी होंगी। रामायण और महाभारत के युद्ध की कहानी के बारे में भी सब लोग जानते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि भगवान विष्णु और भगवान शिव के बीच भी कभी भयंकर युद्ध हुआ था। बहुत ही कम लोगों को ये पता है कि इन दोनों के बीच भी युद्ध हुआ था।
तो आइये आज हम आपको इस रोचक कथा से अवगत कराते हैं जब शिव और विष्णु एक दुसरे से एक खास बात पर भीड़ गए थे।

क्या था युद्ध का कारण ?

ये कहानी भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से जुड़ी हुई है। प्रह्लाद की रक्षा के लिए विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण करके हिरण्यकश्यप का वध अपने पंजे से कर दिया। लेकिन भक्त पर हुए अत्याचार से नाराज नरसिंह पूरी सृष्टि के विनाश के लिए उतारु हो गए। 


उन्होंने समस्त देवताओं यहां तक कि ब्रह्माजी और लक्ष्मीजी की प्रार्थना भी अस्वीकार कर दी। तब सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने अपने गण वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने नरसिंह रुपी विष्णु को उनका असली स्वरुप याद दिलाने का प्रयास किया। लेकिन मोहग्रस्त नरसिंह ने एक न सुनी।

महादेव ने लिया शरभ अवतार :

तब महादेव ने संसार की रक्षा के लिए शरभ अवतार धारण किया। जो वीरभद्र, गरुड़ और भैरव का सम्मिलित स्वरुप था। उसके आठ शक्तिशाली पंजे और शक्तिशाली पंख थे। 


शरभ रूप में एक पंख में वीरभद्र एवं दूसरे पंख में महाकाली स्थित हुए, भगवान शरभ के मस्तक में भैरव एवं चोंच में सदाशिव स्थित हुए और शरभ रूपी शिव ने भगवान नरसिंह को अपने पंजों में जकड़ लिया और आकाश में उड़ गये। शिव अपनी पूंछ में नरसिंह को लपेटकर उसकी छाती में चोंच का प्रहार करने लगे। फिर उन्होंने अपने पंजों से उसकी नाभि को चीर दिया। इससे नरसिंह का मोह नष्ट हो गया। उसका तेज अलग होकर महाविष्णु के रुप में प्रकट हुआ।

तो इस वजह से महादेव पहनते है सिंह कि खाल :

जब शिवजी ने शरभ रूप धर विष्णु के नरसिंह अवतार की नाभि को चीरा था तब विष्णु जी ने महादेव से अनुरोध किया कि नरसिंह के चर्म यानी चमड़ी को अपने वस्त्र के रुप में स्वीकार करके सम्मानित करें।
इसके बाद महान पशुपति शिव ने उस चर्म को अपने वस्त्र और आसन के रुप में धारण किया और भक्तजनों के हृदय में अपना मोहक स्वरुप प्रकाशित किया। 


इसके पहले तक वे अपने वास्तविक स्वरुप में यानी नग्न रहना पसंद करते थे। लेकिन उन्होंने श्रीहरि की विनती स्वीकार करके बाघंबर या सिंहचर्म को वस्त्र के रुप में स्वीकार किया।



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