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दुनिया का अनोखा मंदिर, जहाँ शिवजी के अंगूठे की होती है पूजा-अर्चना | Temple where Thumb of Lord Shiva is worshipped



*यह आर्टिकल राखी सोनी द्वारा लिखा गया है। 

हमारे देश में न सिर्फ अनोखे और विशेष मंदिर स्थापित है, बल्कि उनके पीछे कई रोचक कहानी और किस्से भी है। ऐसा ही एक मंदिर राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है। वैसे तो हर मंदिर में भक्तों को भगवान मूर्ति देखने को मिलती है, जिसकी वे पूरी श्रद्धा के साथ पूजा अर्चना करते हैं, लेकिन यहां स्थित शिव मंदिर में शिवजी की मूर्ति और शिवलिंग की ही नहीं, बल्कि उनके अंगूठे की पूजा की जाती है। ये दुनिया का एकमात्र मंदिर है, जहां भोले बाबा के अंगूठे की पूजा अर्चना की जाती है। माउंट आबू राजस्थान का हिल स्टेशन है, इसलिए हर साल लाखों संख्या में सैलानी यहां घूमने के लिए आते हैं। यहां के पर्यटक स्थल के साथ-साथ ये मंदिर भी लोगों के लिए काफी विशेष स्थान रखता है।


सावन में लगता है मेला :

ये मंदिर आबू पर्वत पर स्थित है, जिसे अचलेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही पंच धातु की बनी नंदी की एक विशाल प्रतिमा है, जिसका वजन लगभग चार टन हैं। मंदिर के गर्भगृह पहुंचने पर धरती में समाये हुए शिवलिंग हैं, जिसके ऊपर की और एक पैर के अंगूठे का निशान उभरा हुआ है। इस अंगूठे को यहां स्वयंभू शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह देवाधिदेव शिव का दाहिना अंगूठा है।

गर्भगृह के बाहर नृसिंह, वामन, कच्छप, मत्स्य, कृष्ण, राम, परशुराम, बुद्ध व कलंगी अवतारों की काले पत्थर की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। ऐसा बताया जाता है कि मेवाड़ के राजा राणा कुंभ ने अचलगढ़ किले का निर्माण इस पहाड़ी पर किया था। इस किले के पास ही महादेव का मंदिर है। वैसे तो साल भर ही इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जा सकती है, लेकिन सावन के महीने में इस दिन में पूजा-अर्चना का विशेष फल प्राप्त होता है। इसलिए इस मंदिर में काफी संख्या में भक्त आते हैं। मेले जैसा माहौल हो जाता है, लोगों को दर्शन करने के लिए काफी लंबा इंतजार करना पड़ता है।

लेते थे न्याय की शपथ :

इस मंदिर का निर्माण काफी खूबसूरत तरीके से किया गया है। मंदिर परिसर में एक चंपा का पेड़ भी है। मंदिर की बायीं बाजू की तरफ दो कलात्मक खंभों का धर्मकांटा बना हुआ है। कहते हैं कि इस क्षेत्र के शासक राजसिंहासन पर बैठने के समय अचलेश्वर महादेव से आशीर्वाद प्राप्त कर धर्मकांटे के नीचे प्रजा के साथ न्याय की शपथ लेते थे।


स्कंद पुराण के अनुसार, जिस तरह वाराणसी शिव की नगरी है तो यह माउंट आबू उपनगरी है। मान्यता है कि अंगूठे ने ही पूरे माउंट आबू पर्वत के हिस्से को थाम रखा है, जिस दिन अंगूठे का निशान गायब हो जाएगा,  उस दिन माउन्ट आबू का पहाड़ खत्म हो जाएगा।

ये है इस मंदिर के निर्माण की कहानी :

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भी एक कहानी है। ऐसा कहा जाता है कि जहां आबू पर्वत स्थित है, प्राचीन काल में वहां पर एक ब्रह्म खाई थी। इस खाई में एक बार वशिष्ठ मुनि की गाय कामधेनु घास चरते हुए गिर गई। उसे बचाने के लिए मुनि ने सरस्वती और गंगा का आह्वान किया, जिससे ब्रह्म खाई पानी से भर गई और कामधेनु गाय जमीन पर आ गई। भविष्य में ये घटना न हो, इसलिए वशिष्ठ मुनि ने हिमालय जाकर पर्वतराज से ब्रह्म खाई को भरने की विनती की। हिमालय ने अपने प्रिय पुत्र नंदी वद्र्धन को जाने का आदेश दिया, जिसे अर्बुद नाग नंदी हिमालय से उड़ा कर ब्रह्म खाई के पास लाया।


इसके बाद वद्र्धन पहाड़ ने मुनि से वरदान मांगा कि उसके ऊपर सप्त ऋषियों का आश्रम होना चाहिए और यह पहाड़ सुंदर और वनस्पतियों से भरपूर होना चाहिए। जबकि इस पहाड़ को यहां तक पहुंचाने वाले अर्बुद नाग ने वर मांगा कि इस पर्वत का नामकरण उसके नाम से हो। इसके बाद से नंदी वद्र्धन आबू पर्वत के नाम से जाना जाने लगा। वरदान प्राप्त कर के जब नंदी वद्र्धन खाई में उतरा तो अंदर धंसता चला गया। सिर्फ इसका नाक और ऊपर का हिस्सा ही जमीन से ऊपर रहा। इसके बाद मुनि के निवेदन पर भगवान शिव ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे से इसे अचल कर दिया।  भगवान शिव के अंगूठे का महत्व होने की वजह से यहां महादेव के अंगूठे की पूजा की जाती है।



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