Hinduism

महाशिवरात्रि व्रत के फल की चिंता ना करें क्योंकि फल हम यहाँ बता रहे हैं | What are the benefits of Mahashivratri vrat ?



हर कोई चाहता है कि वह भगवान की आराधना करे, उपवास रखे। साथ ही वह भगवान से अपनों के दुखों को दूर करने का भी वरदान मांगता है और जीवन में तरक्की की कामना करता है। हम आपको बताते हैं कि शिव की उपासना और व्रत रखने से क्या-क्या फल मिलते हैं। माना जाता है कि महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहूर्त में शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि और नौकरी में तरक्की मिलती है।

प्रथम फल :

शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है। बीमारी से परेशान होने पर और प्राणों की रक्षा के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। याद रहे, महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला से ही करें। मंत्र दिखने में जरूर छोटा दिखाई देता है, किन्तु प्रभाव में अत्यंत चमत्कारी है।

द्वितीय फल :

शिवरात्रि के दिन एक मुखी रुद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रुद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रख सकते हैं। मंत्र इस प्रकार है- ॐ नम: शिवाय।

तृतीय फल :

सृष्टि से तमोगुण तक के संहारक सदाशिव की आराधना से लौकिक और परलौकिक दोनों फलों की उपलब्धता संभव है। तमोगुण की अधिकता दिन की तुलना में रात्रि में अधिक होने से भगवान शिव ने अपने लिंग के प्रादुर्भाव के लिए मध्यरात्रि को स्वीकार किया। यह रात्रि फाल्गुन कृष्ण में उनकी प्रिय तिथि चतुर्दशी में निहित है। वर्ष की तीन प्रमुख रात्रि में शिवरात्रि एक है। इस दिन व्रत करके रात्रि में पांच बार शिवजी के दर्शन-पूजन-वंदन से व्यक्ति अपने समस्त फल को सुगमता से पा सकता है।

चतुर्थ फल :


इस पर्व का महत्व सभी पुराणों में वर्णित है। इस दिन शिवलिंग पर जल अथवा दूध की धारा लगाने से भगवान की असीम कृपा सहज ही मिलती है। इनकी कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। 
'जय-जय शंकर, हर-हर शंकर' का कीर्तन करना चाहिए। इस दिन सामर्थ्य के अनुसार रात्रि जागरण अवश्य करना चाहिए। शिवालय में दर्शन करना चाहिए। कोई विशेष कामना हो तो शिवजी को रात्रि में समान अंतर काल से पांच बार शिवार्चन और अभिषेक करना चाहिए। किसी भी प्रकार की धारा लगाते समय शिवपंचाक्षर मंत्र का जप करना चाहिए। 



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