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चूड़ामणि मंदिर, यहाँ चोरी करने से मिलता है पुत्र प्राप्ति का वरदान | Chudamadi Temple where stealing is a boon



*यह आर्टिकल राखी सोनी द्वारा लिखा गया है। 

वैसे तो हमारे देश में लाखों करोड़ों मंदिर है। हर मंदिर से कोई न कोई कहानी भी जुड़ी हुई है, लेकिन कुछ मंदिर ऐसे भी है, जिनके बारे में सुनकर काफी हैरानी होती है। ऐसे मंदिर के पीछे काफी रोचक कहानियां भी होती है। ऐसा ही एक मंदिर है सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर। 

कहाँ है ये मंदिर ?

ये मंदिर उत्तराखंड में रूड़की शहर के गांव चूडिय़ाला गांव में स्थित है। वैसे तो हमें बचपन से बताया जाता है कि अगर हम चोरी करेंगे तो हमें भगवान माफ नहीं करेंगे। इतना ही नहीं, हमें पुलिस पकड़ कर भी ले जाएगी। लेकिन इस मंदिर में चोरी करने से लोगों को सजा नहीं मिलती है, बल्कि पुत्र प्राप्ति का वरदान मिलता है। कहा जाता है कि अगर किसी दंपत्ति को पुत्र चाहिए तो वे इस मंदिर में आकर अगर मां के चरणों से लकड़ी का गुड्डा चुराकर अपने साथ ले जाता है तो उसे पुत्र प्राप्ति जरूर होती है। 



मन्नत पूरी होने के बाद उसे मां के दरबार में मात्था टेकने आना पड़ता है। पुत्र होने पर भंडारा कराने के साथ ही दंपति आषाढ़ माह में ले गए लोकड़े के साथ ही एक अन्य लोकड़ा भी अपने पुत्र के हाथों से भी चढ़वाते है। अब तक कई लोगों की मन्नत इस मंदिर में आने से पूरी हो चुकी है। इसलिए हर दिन यहां कई संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और मां से पुत्र प्राप्ति का वरदान भी मांगते हैं। 

कैसे हुआ इस मंदिर का निर्माण ?

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भी रोचक कहानी है। कहा जाता है लढ़ौरा रियासत के राजा के एक बार जंगल में शिकार खेलने गए, तब उन्हें घूमते-घूमते माता के पिंडी रूप में दर्शन हुए। राजा के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए राजा ने मां से पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी। जब राजा के पुत्र हुआ तो उन्होंने इस मंदिर का निर्माण कराया। 

क्यों पड़ा मां का नाम चूड़ामणि 


इस देवी को चूड़ामणि देवी के नाम से जाना जाता है। इसके पीछे भी एक कथा है। हमारे ग्रंथों के अनुसार एक बार माता सती के पिता ने यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में देवी-देवताओं को बुलाया गया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा गया। इस बात से माता सती नाराज हो गई। उन्होंने अपने पिता से शिव जी को बुलाने के लिए कहा, लेकिन उनके पिता ने उनकी बात नहीं मानी। 



गुस्से में आकर माता सती ने यज्ञ में कूदकर यज्ञ को विध्वंस कर दिया था। भगवान शिव जब माता सती के मृत शरीर को लेकर जा रहे थे, तब माता का चूड़ा इस घनघोर जंगल में गिर गया था, जिसके बाद यहां पर माता की पिंडी स्थापित होने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। वैसे तो सालभर ही मां के दर्शन करने वाले लोगों का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्र के दिनों में यहां मेले का आयोजन किया जाता है। काफी संख्या में लोग इस मेले में हिस्सा लेते हैं। 



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