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वो यज्ञ जिसकी आहुति बन गयी माँ सती | How Goddess Sati died ?



पौराणिक कथा : वो यज्ञ जिसकी आहुति बन गयी माँ सती 

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महाराज दक्ष एक बहुत ही ज्ञानी और और संपन्न पुरुष थे | जब हर चीज की अधिकता होती है तब अहंकार भी स्वतः ही अधिक हो जाता है | उन्हें अपने यश, कौशल और धन-धान्य पर बहुत अभिमान था | उनको एक शक्तिशाली पुत्र की इक्षा थी पर उनको सिर्फ पुत्रियाँ ही प्राप्त हुई | उन्ही पुत्रियों में से एक थीं देवी सती | सती साक्षात देवी आद्या का अवतार थी | जब माँ सती विवाह योग्य हुई तो दक्ष उनके लिए वर खोजने लगे | चूँकि आद्या के रूप के लिए सिर्फ कोई आदि पुरुष ही योग्य हो सकता था इसीलिए दक्ष ने भगवान शिव से माता सती का विवाह निश्चित किया | हांलाकि दक्ष इस विवाह से प्रसन्न नहीं थे | उन्हें भगवान् शिव अपने राजसी परिवार से मेल खाते नहीं लगते थे | चूंकि शिव का यश दक्ष से कहीं ज्यादा था तो दक्ष इस बात से भी काट खाते थे |
एक बार की बात है, कनखल नामक स्थान पर दक्ष ने धर्म के निरूपण के लिए एक बहुत ही भव्य और प्रकांड यज्ञ का आयोजन किया | इस यज्ञ में सभी देवता, भगवान और ऋषि मुनि आये सिवाय भगवान शंकर के क्योंकि दक्ष ने इर्ष्यावश उन्हें न्योता ही नहीं दिया | इस बात से शिव तो नहीं पर सती थोड़ी आहात हुई | उन्होंने भगवान् शिव से इस अनुष्ठान में जाने की अनुमति मांगी | भगवान शिव ने उन्हें जाने से मना किया | न मानने पर भगवान शिव ने अपने एक गण वीरभद्र को माता के साथ भेज दिया | माता सती बिना किसी निमंत्रण के अपने पिता के यज्ञ में सम्मिलित होने चली गयीं |


यज्ञ में पहुंचकर माता सती ने देखा की वहां हर किसी देवता के लिए यज्ञ की एक आहुति डाली जा रही है सिवाय भगवान शिव के | वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं, 'पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं, किंतु कैलाशपति का भाग नहीं है | आपने उनका भाग क्यों नहीं दिया?' दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया, 'मै तुम्हारे पति कैलाश को देवता नहीं समझता | वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला है | वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं | उसे कौन भाग देगा |
सती के नेत्र लाल हो उठे | उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा,'पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया है। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती |' सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी | यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया | देवता उठकर खड़े हो गए | वीरभद्र क्रोध से कांप उटे | वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे | वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया | 




समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा | वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे | सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए | सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया | भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हिए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। 



सृष्टि व्याकुल हो उठी, भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े | वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे | धरती पर 51 स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे | जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे।

धरती पर जिन 51 स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं |



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