मोहिनी एकादशी का वो व्रत जिसे सफलता के लिये श्रीराम और युधिष्ठिर ने भी किया था | Mohini Ekadashi Vrat Story



*यह आर्टिकल राखी सोनी द्वारा लिखा गया है। 

दुखों से मुक्ति के लिए करें मोहिनी एकादशी का व्रत :


बैसाख माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोकहनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। वैसे तो हर एकादशी का अपना महत्व होता है, लेकिन इस माह की एकादशी को करने से मनुष्य को न सिर्फ समस्त पापों से बल्कि दुखों से भी मुक्ति मिलती है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को श्रीराम और युधिष्ठर ने भी किया था और अपने समस्त दुखों से मुक्ति पाई थी। ये व्रत मोह बंधन से भी मुक्ति दिलाता है। 

ये है व्रत कथा :

एक बार श्रीकृष्ण से युधिष्ठर से मोहनी एकादशी के व्रत और उसके महत्व को जानने की इच्छा जाहिर की। इसपर श्रीकृष्ण ने उन्हें वो कथा सुनाई जो गुरु वशिष्ठ ने श्रीराम को सुनाई थी। दरअसल श्रीराम ने अपने गुरु से कहा, मैंने सीता के वियोग में काफी दुख झेले हैं, इसलिए ऐसा कोई व्रत बताओ, जिससें मैं अपने समस्त दुखों से मुक्ति पा सकूं। इस पर गुरु वशिष्ठ ने राम जी को मोहनी एकादशी का व्रत बताया। उन्होंने कहा कि ये व्रत दुखी मनुष्य को अवश्य करना चाहिए, इससे वे अपने सभी पापों और दुखों से मुक्ति पाता है।  


इसकी कथा इस प्रकार है कि दरअसल सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नामक एक नगरी थी। इसी नगरी में धन-धान्य से पूर्ण पुण्यवान धनपाल नामक एक व्यक्ति रहता था। वह सदा पुण्य कर्म में ही लगा रहता था। उसके पांच पुत्र थे। उसका सबसे छोटा पुत्र धृष्टबुद्धि का था। वे अपने पिता के धन को यूं ही बर्बाद करता रहा था। नशा और जुआ खेलता था। एक बार उसे वेश्याओं के साथ नगर में घूमते हुए देखा गया। इस बात से उसके पिता को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने उसे घर से बाहर निकाल दिया। गरीबी की वजह से काफी दुखी रहना लगा और चोरी करने लगा। इस वजह से उससे कई बार कारवास की सजा भी सुनाई गई। बाद में राजा ने उसे अपने नगर से निकाल दिया। वे वन में एक दिन भटकते भटकते हुए महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम पर जा पहुंचा। वैशाख का महीना था। 


कौण्डिल्य गंगा में स्नान करके आए थे। वे मुनिवर कौण्डिल्य के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, ब्र्राह्मण ! मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए, जिससे मुझे मेरे समस्त पापों और दुखों से मुक्ति मिल सके।  तब कौण्डिल्य बोले, वैशाख मास के शुक्लपक्ष में मोहिनी एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्घि ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया।  जिससे उसे सभी दुखों से मुक्ति मिली। 

इन बातों का रखें ध्यान :


इस व्रत को करने के लिए सुबह जल्दी उठाना चाहिए। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके श्रीराम और विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए। उन्हें मिठाइयों का भोग लगाना चाहिए। किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। भजन कीर्तन में वक्त बिताना चाहिए।  



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